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डॉ.अर्चना डिमरी के शोध ग्रन्थ उत्तराखण्ड आंदोलन अहिंसात्मक जनांदोलन का विमोचन

डॉ.अर्चना डिमरी के शोध ग्रन्थ उत्तराखण्ड आंदोलन अहिंसात्मक जनांदोलन का विमोचन

देहरादून

150 वीं गांधी जयन्ती 2 अक्टूबर के अवसर पर आज शहीद स्थल , कचहरी प्रांगण में उत्तराखंड आन्दोलन के समस्त शहीदों को समर्पित करते हुए डा.अर्चना डिमरी द्वारा रचित शोध ग्रन्थ उत्तराखंड आन्दोलन ..अहिंसात्मक जनांदोलन का लोकार्पण उत्तराखंड आन्दोलनकारियों द्वारा सामूहिक रूप से किया गया ।
इस अवसर पर उत्तराखंड राज्य आन्दोलनकारी लोकेश नवानी , विजय जुयाल , प्रदीप कुकरेती ,जगमोहन नेगी, रविन्द्र जुगरान , सुशीला बलोनी , कमला पन्त , तन्मय ममगाईं , संजय कोठियाल , गुणानन्द जखमोला , रानू बिष्ट आदि उपस्थित थे।
शोध ग्रन्थ में कइ विद्वानो ने अपने विचार रखे। उत्तराखंड आन्दोलन का मर्म और मंतव्य में इतिहासकार डा. शेखर पाठक , कहते हैं कि उत्तराखंड आन्दोलन न सिर्फ नए राज्य की जरुरत की अभिव्यक्ति थी बल्कि इसके साथ एक बेहतर समाज और जुझारू मनुष्य बनने और बनाने का संकल्प जुड़ा था। यह एक ऐसी विश्वसनीय और टिकाऊ सामाजिक,आर्थिक व्यवस्था के निर्माण की लड़ाई थी जिसमें मानव समाज और प्राकृतिक सम्पदा की हिफाजत और सदुपयोग साथ-साथ हो सके।
उत्तराखंड आन्दोलनकारी लोकेश नवानी ने कहा कि उत्तराखंड राज्य आन्दोलन इतिहास का महत्वपूर्ण कालखंड है।इस ग्रन्थ में उत्तराखंड के स्वतंत्रता से पूर्व व् पश्चात् के आंदोलनों का समावेश किया गया है , जिसमे कुली-बेगार , शिल्पकार सुधार , डोला पालकी , चिपको आन्दोलन आदि शामिल है।
उत्तराखंड आन्दोलनकारी विजय जुयाल , जिन्होंने उत्तराखंड आन्दोलन के समय जन जागरूकता की अलख जगाने के लिए पैदल 1100 गांवों का भ्रमण किया ने कहा कि इस ग्रन्थ में उत्तराखंड क्षेत्र की विषम परिस्थितियों को समझने तथा उत्तराखंड आन्दोलन को सिल-सिलेवार रूप से अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।
शोध ग्रन्थ की लेखिका ओर शोधकर्ती डा.अर्चना डिमरी ने कहा कि उत्तराखंड आन्दोलन क्षेत्रीय इतिहास ही नहीं बल्कि आधुनिक भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण जन आन्दोलन रहा है। अपने सबसे महत्वपूर्ण मूलतत्व ‘ अहिंसा ‘ का प्रतीक यह आन्दोलन आज के दौर में ही नहीं बल्कि भविष्य में जन आन्दोलनों के प्रेरणा स्रोत के रूप में जाना जाएगा। शोध ग्रन्थ में उत्तराखंड आन्दोलन की पृष्ठभूमि , इतिहास और तत्कालीन परिस्थितियों पर प्रकाश डालने के साथ-साथ जन प्रतिनिधित्व और जन भागीदारी के विभिन्न रूपों को आम जन तक पंहुचाने का प्रयास है। राष्ट्रीय व् क्षेत्रीय अभिलेखागार में संरक्षित लेखों , आन्दोलन में सक्रिय व्यक्तियों से भेंट वार्ताओं , समाचार पत्रों , उत्तराखंड राज्य निर्माण संबंधी विधेयकों , विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं व् जर्नल इत्यादि के आधार पर यह पुस्तक बन पायी। यह पुस्तक विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए लाभदायक सन्दर्भ सामग्री होगी।

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