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संसार को ‘डिजरी डू’ की गूंज सुनाने वाला मुकेश खुद सो गया…

संसार को ‘डिजरी डू’ की गूंज सुनाने वाला मुकेश खुद सो गया…

देहरादुन/ऋषिकेश

डिजरी डू यानी एक ऐसा म्यूजिकल इंट्रुमेंट जो संसार भर में अपनी अनोखी धुन के लिए जाना जाता हो लेकिन आज इसको दुनिया से रूबरू करवाने वाला शख्स हमारे बीच नही रहा।
डिजरी डू वाद्य यंत्र को ईजाद करने वाले देवभूमि ऋषिकेश के मुकेश धीमान के निधन से पूरी दुनिया मे फैले उनकी कला के प्रशंसक निराश हैं। यहां बता देना जरूरी भी है कि दुनिया के दर्जनों देशों में आज मुकेश के हाथों से बने डिजरी डू हैं।
दुनिया भर के अखबारों,मैगज़ीन ओर चेनलो ने उनको कवर किया है।ऋषिकेश के वरिष्ठ पत्रकार दुर्गा नोटियाल मुकेश धीमान की इस अनूठी विद्या पर कहते हैं कि
‘डिजरी डू’ नाम का अनूठा वाद्य यंत्र इजाद करने वाले और इसकी धुन से पूरी दुनिया को बांधने वाला कलाकार आज खुद खामोश हो गया है। ऋषिकेश को अलग पहचान देने वाले ‘डिजरी डू’ के निर्माता मुकेश धीमान अब सिर्फ यादों में ही शेष रह जाएंगे। हालांकि उनके सैकड़ों शिष्य इस वाद्य को तरसते रहेंगे लेकिन फिर भी ‘डिजरी डू ‘ की गूंज दुनिया के कोने-कोने में गूंजती रहेगी।
डिजरी डू वाद्य यंत्रों की शृंखला में एक बेजोड़ वाद्य है, जिस विदेशी पर्यटक खूब पसंद करते रहे हैं। यहां पर ये जिक्र करना भी जरूरी हो जाता है कि इस वाद्य को मुकेश धीमान ने 80 के दशक में ही ऑस्ट्रेलियाई पर्यटक ऑलिस्टर बुलट के कहने पर सबसे पहले इजाद किया था। मुकेश ने उस बांस के टुकड़े में ऐसी जान फूंकी कि ऑलिस्टर बुलेट उसे मुकेश की कारीगरी की निशानी मान अपने साथ ही ले गए। मुकेश ने बांस का ही एक डिजरी डू स्वयं के लिए बनाया और खाली वक्त में उसे बजाने लगे। धीरे-धीरे रेलवे रोड स्थित दुकान पर इस वाद्ययंत्र को सुनने के लिए भीड़ जुटने लगी। एसबीआइ की शाखा पास होने के कारण वहां करेंसी बदलने आने वाले विदेशी पर्यटकों का ध्यान भी गया। फिर क्या था यह वाद्ययंत्र विदेशियों की खास पसंद बन गया। कुछ ही वर्षों में डिजरी डू की विदेशों में इतनी मांग बढ़ गई कि मुकेश को डिमांड पूरी करने के लिए रात-दिन कड़ी मेहनत करनी पड़ी तब इन्होंने
शीशमझाड़ी में एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर अपनी कार्यशाला को जंगल वाइब्स नाम दिया।

 


करीब 40 वर्षों में मुकेश धीमान ने सैकड़ों डिजरी डू तैयार किए और विदेशी पर्यटकों के हाथों से बनवाये भी।
जो दुनिया के कई देशों में पहुंच गए। यही नहीं दर्जनों विदेशी पर्यटक ‘डिजरी डू’ बनाने की कला सीखने यहां आते रहे।
हरसाल मुकेश 30 से 40 डिजरी डू तैयार करते थे।
इनके बनाये ‘डिजरी डू’ स्पेन, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इजरायल, पुर्तगाल, साउथ अफ्रीका, चीन आदि दो दर्जन से अधिक देशों तक पहुंच गए।
मुकेश ने कभी अपने हुनर का बखान नहीं करते थे, बल्कि विदेशी उन्हें खोजते हुए ही उनकी कार्यशाला तक पहुंचते थे। विदेशी प्रशंषको की डिमांड पर मुकेश ने डिजरी डू के साथ लकड़ी के अफ्रीकन ड्रम, कलिंवा व टीपी भी तैयार किये। अपने इस हुनर के लिए विश्व भर में पहचान रखने वाले मुकेश धीमान चकाचौंध से हमेशा दूर रहे। उनका अलग टाइप का पहनावा और रहन-सहन उनकी अलग पहचान को दर्शाता था। मगर, अब यह शख्सियत कभी नजर नहीं आएगी। रविवार को हृदय गति रुकने से मुकेश धीमान का निधन हो गया। जिसके बाद उनके प्रशंसक और उनके शिष्य गहरे शोक में हैं।

धीमान ने अपनी लाइफ में सबसे बड़ा डिजरी डू सात फीट लंबा और तीन फीट की गोलाई वाला बनाया था, जिसे इजरायल के एक दंपती बबैत व टॉम अपने साथ ले गए थे। जबकि, ढाई फीट लंबे और 22 इंच गोलाई वाले सबसे छोटे डिजरी डू को स्विट्जरलैंड निवासी एक युवक ने खरीदा ।

कुछ साल पहले ही मुकेश ने नीर गांव के निकट कटली में प्रकृति के बीच खूबसूरत जगह पर उनके विदेशी मित्रों व शिष्यों के आर्थिक सहयोग से स्टूडियो भी तैयार किया ताकि संगीत प्रेमियों की संगीत साधना में कोई खलल न पड़े। हालांकि स्टूडियो को वे ज्यादा दिन नहीं चला सके।
मुकेश धीमान के निधन का समाचार पाकर उनके शिष्य व विदेशी प्रशंसक बेहद दुखी हैं मुकेश के साथ लंबा समय बताने वाले कनाडा निवासी फ्रैंक मार्केनी खबर सुनकर फुट फुट कर रो पड़े अपने व्हाट्सएप पेज पर मुकेश धीमान की यादों के साथ अपनी श्रद्धांजलि में लिखा कि भारत में रहते हुए उनको मुकेश के साथ संगीत के माध्यम से अध्यात्म के दर्शन हुए। वह एक जिंदादिल इंसान थे।

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