देहरादून
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने के बाद हलाला से जुड़े पहले मामले में पति समेत 9 लोगों को बनाया आरोपी बना मुकदमा दर्ज किया गया है। हरिद्वार जिले के बुग्गावाला क्षेत्र की एक महिला की शिकायत पर उसके पति और ससुराल पक्ष के कई लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर पुलिस ने चार्जशीट भी अदालत में दाखिल कर दी है। यह मामला UCC के तहत दर्ज देश का पहला हलाला केस माना जा रहा है।
पीड़िता शाहिन ने आरोप लगाया है कि शादी के बाद से उसे लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। महिला का कहना है कि पति और ससुराल पक्ष ने उस पर जबरन हलाला करने का दबाव बनाया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और घर से निकाल दिया गया। मामले में 11 लोगों को गवाह बनाया गया है।
पीड़िता ने 4 अप्रैल 2026 को बुग्गावाला थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में उसने पति समेत ससुराल पक्ष पर दहेज उत्पीड़न, मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और मुस्लिम विवाह कानून के उल्लंघन के आरोप लगाए थे।
महिला के अनुसार, इस वर्ष की शुरुआत में हलाला का विरोध करने पर उसे घर से बाहर निकाल दिया गया था, जिसके बाद उसने पुलिस की शरण ली।
पुलिस ने मामले में पति मोहम्मद दानिश, ससुर सईद, जेठ मोहम्मद अरशद, देवर परवेज और जावेद, सास गुलशाना, ननद सलमा, नंदोई फैजान और देहरादून निवासी रहमान के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
जांच के दौरान रहमान का नाम सामने आने पर उसे भी नामजद आरोपी बनाया गया। मुख्य आरोपी मोहम्मद दानिश के अलावा मोहम्मद अरशद, परवेज, जावेद और गुलशाना के खिलाफ भी गंभीर आरोप पाए गए हैं।
मामले की जांच उपनिरीक्षक मनोज कुमार ने की। जांच के दौरान पुलिस ने पीड़िता और गवाहों के बयान दर्ज किए, मेडिकल रिपोर्ट और डॉक्टरों की राय ली तथा घटनास्थल का निरीक्षण भी किया।
पुलिस के अनुसार जांच में उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (UCC) की धारा 32(1)(ii) और 32(1)(iii) के उल्लंघन के साक्ष्य मिले हैं। साथ ही दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और अन्य आरोप भी सही पाए गए।
चार्जशीट में जिन प्रमुख धाराओं का उल्लेख है, उनमें दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धारा 3 और 4 शामिल हैं। इसके अलावा मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों की सुरक्षा) अधिनियम 2019 की धारा 3 और 4 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 85 और 115(2) भी लगाई गई हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तराखंड समान नागरिक संहिता 2024 (संशोधित 2026) की धारा 32(1)(ii) और 32(1)(iii) भी आरोपों में शामिल की गई हैं।
उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने समान नागरिक संहिता लागू की है। ऐसे में किसी आपराधिक मामले में UCC की धाराओं का उपयोग होना अपने आप में बड़ा कानूनी घटनाक्रम माना जा रहा है। चार्जशीट में शामिल धारा 32(1)(ii) और 32(1)(iii) विवाह पंजीकरण और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन से संबंधित मानी जा रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि जांच एजेंसियां अब वैवाहिक विवादों में UCC के प्रावधानों को भी सक्रिय रूप से लागू कर रही हैं।
अब मामला न्यायालय में विचारण के लिए जाएगा। अदालत पहले आरोपपत्र का परीक्षण करेगी और उसके बाद आरोप तय करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यदि अदालत को प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो सभी आरोपियों पर मुकदमा चलेगा। दूसरी ओर बचाव पक्ष को भी अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
इन दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि सभी आरोपियों का सत्यापन किया गया है। हालांकि चार्जशीट में किसी बड़ी बरामदगी या संपत्ति जब्ती का विशेष उल्लेख नहीं मिला। कई कॉलम औपचारिक रूप से खाली छोड़े गए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि मामला मुख्य रूप से वैवाहिक उत्पीड़न और कानूनी उल्लंघनों पर केंद्रित है।
उक्त प्रकरण उत्तराखंड में लागू UCC के वास्तविक क्रियान्वयन की दिशा में शुरुआती मामलों में गिना जा सकता है। अब तक UCC को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस अधिक थी, लेकिन इस तरह के मामलों से यह स्पष्ट होगा कि कानून व्यवहारिक स्तर पर कैसे लागू हो रहा है और उसका सामाजिक प्रभाव क्या पड़ रहा है।राजनीति
बताते चलें कि हलाला या निकाह हलाला इस्लामी वैवाहिक प्रथा से जुड़ा एक विवादित विषय है।
जानकारी के अनुसार सामान्य तौर पर इसका संदर्भ उस स्थिति से होता है जब किसी मुस्लिम दंपति में पति द्वारा तलाक दिए जाने के बाद दोबारा शादी करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं।
परंपरागत व्याख्या के अनुसार, यदि किसी पुरुष ने अपनी पत्नी को तीन तलाक देकर विवाह समाप्त कर दिया, तो वह महिला उसी पति से दोबारा निकाह तभी कर सकती है जब वह किसी दूसरे पुरुष से निकाह करे, वह विवाह वास्तविक वैवाहिक संबंध के रूप में हो, बाद में किसी कारण से दूसरा पति तलाक दे या उसकी मृत्यु हो जाए और इसके बाद ही महिला पहले पति से दोबारा निकाह कर सकती है। इसी प्रक्रिया को आम बोलचाल में “हलाला” कहा जाता है।
हालांकि, जबरन या योजनाबद्ध तरीके से हलाला कराना बेहद विवादित माना जाता है। कई मुस्लिम विद्वान भी ऐसे “फिक्स्ड” या मजबूरी वाले हलाला को धार्मिक रूप से गलत बताते रहे हैं। भारत में भी इस विषय पर लंबे समय से कानूनी और सामाजिक बहस चलती रही है।
भारत में 2019 में केंद्र सरकार ने तीन तलाक को अवैध घोषित किया था। इसके बाद जबरन हलाला और बहुविवाह जैसे मुद्दों पर भी अदालतों और सरकारों में चर्चा बढ़ी। उत्तराखंड में लागू UCC के बाद ऐसे मामलों को लेकर कानूनी कार्रवाई का दायरा और अधिक बढ़ गया है।