देहरादून/हरिद्वार
बरसों से तीर्थ नगरी हरिद्वार में हर सावन में अलग अलग तरह से भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए उनके भगत कांवड़ लेने आते रहे हैं।
आजकल फिर से सावन का महीना आते ही सरगर्मियां शुरू हो चुकी हैं 30 जुलाई से मंदिर गुलजार नजर आएंगे। वहीं इन दिनों विश्वविख्यात कांवड़ यात्रा अपने आध्यात्मिक वैभव के साथ आगे बढ़ रही है। शिवभक्त मां गंगा की पवित्र धारा से गंगाजल भरकर अपने-अपने शिवालयों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। वहीं इनके बीच एक ऐसा भावपूर्ण दृश्य देखने को मिला जिसने सनातन संस्कृति के महान आदर्श श्रवण कुमार की याद ताजा कर दी।
बताते चलें कि अलीगढ़ के ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े और वर्तमान में नोएडा सेक्टर-5, गौतमबुद्ध नगर में रहने वाले हिमांशु चौहान, जो पानी के व्यवसायी हैं तथा उनके छोटे भाई प्रिंस राघव, जो कक्षा 11 के छात्र हैं, अपनी तीन मौसेरी बहनों के साथ हरिद्वार पहुंच गए। मां गंगा में स्नान का पुण्य लेते हुए ,जल भरने के बाद उन्होंने कांवड़ में एक ओर अपनी 85 वर्षीय नानी रूपरानी को सम्मानपूर्वक बैठाया और दूसरी ओर तीन पवित्र कलश लेकर एक कठिन पदयात्रा पर निकल पड़े हैं।
दोनों भाइयों का संकल्प है कि वे 11 अगस्त को नोएडा सेक्टर-2 स्थित बड़े महादेव मंदिर में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करेंगे। उनके साथ उनकी तीन बहनें लक्ष्मी चौहान, खुशी तोमर और जानवी राघव तथा परिवार के सदस्य भी पैदल यात्रा में साथ हैं। सभी लोग रास्ते में अपने हाथों से भोजन बनाकर एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
नानी रूपरानी ने भावुक होकर कहा कि आज के समय में कई बच्चे अपने माता-पिता और बुजुर्गों को घर से निकाल दे रहे हैं। वे वृद्धाश्रम का सहारा लेने को मजबूर हो रहे हैं। लेकिन मेरे ये दोनों बच्चे मुझे अपने कंधों पर बैठाकर कांवड़ यात्रा करा रहे हैं। ये मेरे लिए श्रवण कुमार से कम नहीं हैं। मैं भगवान शिव और मां गंगा से इनके सुखी, स्वस्थ और उज्ज्वल जीवन की प्रार्थना कर रही हूं। बहनें लक्ष्मी चौहान,खुशी तोमर,जानवी राघव बोलीं कि हमारे भाई आज के युग के श्रवण कुमार हैं। उनके भाई अपनी नानी का जो सम्मान कर रहे हैं, वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कि वे भी इस कठिन यात्रा में अपने भाइयों की सहयोगी बन उनका हौसला बढ़ा रही हैं। हालांकि भाइयों के दादा-दादी अब नहीं हैं, इसलिए वे अपनी नानी को वही सम्मान और प्रेम दे रहे हैं जो हर बुजुर्ग का अधिकार है और जो उनको मिलना चाहिए।
यह यात्रा केवल गंगाजल लाने की यात्रा नहीं रह गई, बल्कि यह बुजुर्गों के सम्मान, पारिवारिक संस्कार और सनातन संस्कृति का जीवंत उदाहरण बन गई है। जहां एक ओर समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा की घटनाएं सामने आती हैं, वहीं इन दो भाइयों ने अपने आचरण से यह संदेश दिया है कि माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा ही सच्ची शिवभक्ति है।
त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थयात्रा कराई थी। आज कलियुग में हिमांशु चौहान और प्रिंस राघव ने अपनी वृद्ध नानी को कांवड़ में बैठाकर यह सिद्ध कर दिया कि सनातन संस्कृति केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि संस्कारवान संतानों के आचरण में जीवित है।
वर्तमान परिदृश्य में जब परिवारों में बुजुर्गों की उपेक्षा की चर्चा होती है, तब यह परिवार पूरे समाज के सामने एक संदेश लेकर खड़ा है बुजुर्ग बोझ नहीं, परिवार की सबसे बड़ी धरोहर हैं। यदि हर घर में ऐसे संस्कार हों, तो वृद्धाश्रमों की आवश्यकता स्वयं समाप्त हो जाएगी।

