NBT पुस्तक मेले में डॉ.अतुल खरीद लाए नौकर की कमीज,गजब के खरीदार निकले, भीड़ में कई रचनाकारों की पुस्तकों पर डाली निगाह

देहरादून

इन दिनो देहरादून के परेड ग्राउंड में NBT का पुस्तक मेला चल रहा है। रोज कोई न कोई सेलिब्रिटी मेले में आ रहे है। इसके पीछे सोच सिर्फ इतनी ही है कि किसी भी तरह से लोगों के बीच इस सोशल मीडिया के दौर में भी पुस्तकों के प्रति लगाव को जगाया जाए।

ऐसे में गुरुवार को दुनिया भर में अपनी जनकवि के रूप में पहचाने जाने वाले जनकवि डॉ.अतुल शर्मा मेले में पहुंच गए। जानिए उन्होंने मेंले में क्या देखा? क्या खरीदा?,जानिए उनके विचार…

राजकमल प्रकाशन से ज्ञानपीठ पुरुस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ” नौकर की कमीज़ ” और उनकी प्रतिनिधि कविताये खरीद लाया। साथ मे इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार ममता कालिया का कहानी संग्रह भी खरीदा।

किताबों के बीच अच्छा लगा। बहुत। यही सोच चल रही थी कि देहरादून मे पुस्तक मेला चल रहा है तो मुझे ज़रूर जाना ही है। पुस्तकों से नाता है अटूट।

तो चला गया साथ मे दोनो दीदी भी गयी।

वहाँ जाकर बहुत सी स्मृतियों की लम्बी श्रृंखला चलचित्र की तरह सामने तैरने लगीं।

बात आठवें से नवें दशको के बीच की रही होगी। मैने लाईब्रेरी बुक सप्लाई का काम शुरू किया था।

लाईब्रेरी मे दिल्ली के प्रकाशकों की सप्लाई करता था। तीन चार लाख के पुस्तकों की खरीद और सप्लाई की तो मुझे चालीस प्रतिशत डिस्काउंट और क्रैडिट मिलने लगा। हिन्दी के बड़े प्रकाशनों के साथ यह कार्य करता था। एक बार कथाकार भ त्यागी मेरे साथ राजकमल प्रकाशन मे गया था जहाँ मोहन गुप्त _ मिले थे। वाणी प्रकाशन राधा कृष्ण प्रकाशन यही अरुण जी थे,सचिन प्रकाशन यहां अनिल पालीवाल थे,हिन्दी बुक सैंटर प्रकाशन संस्थान सरस्वती प्रकाशन,,,, आदि दरियाग़ंज के पीछे अंसारी रोड पर थे। हिन्दी बुक सैंटर आसिफ अली रोड पर था।

मैने इनमे से बहुत सी पुस्तकों को बल्क मे लिया और सप्लाई की।

होता यह था प्रकाशनों की पुस्तकों को अपने पास लाता । घर मे किताबें भरी रहती थीं। उनका बिल बनाया जाता। पैकिंग की जाती और विश्व विद्यालय, कालेज आफिस की लाईब्रेरी मे छोड़ ने जाता था। चैक मिलने की दुरुह प्रक्रिया थी। मिलते ही प्रकाशकों के पास भेज देता। समय से पहले। मार्च मे या उससे कुछ पहले सप्लाई होती।

पुस्तकों की स्टोल पर सब चेहरे बदल गये है ‌‌। नये लोग दिखे।

बात भी तो चालीस साल के बीत जाने की है।

अक्सर होता यह भी था कि जो किताबें मंगाई जातीं उनमे महत्वपूर्ण पुस्तके अपने लिए भी मंगा लेते। लाइब्रेरी बढ़ती रही।

आर्डर बुक बिलबुक, रसीद, बैड, विज़िटिंग कार्ड भी छपवा लिये थे।

उस समय रेलवे से बिल्टी के मार्फत किताबें आतीं ‌। वीपी पी और पार्सल से भी।

अच्छा था ये काम । बहुत मार्जन होता है प्रकाशन के कार्य मे। वैसे अक्सर लोग इसे कहते नही है। पर यह तो पुस्तकों का व्यवसाय है तो मुनाफा तो ज़रुरी है और स्वाभाविक भी।

कुछ लोग लेखको से पैसे लेकर उनकी पुस्तकों को छापते हैं। और यह मुद्रण का विशुद्ध कार्य होता है,,, लेकिन प्रकाशन के विभिन्न अंगो और प्रक्रिया को लेखक नहीं जानते तो अक्सर ऐसा होता हो शायद अपने पैसे लगाकर वह प्रकाशक के रुप मे उन्हे स्वीकार कर लेता है ‌। सुविधा होती है और दोनो की सहमति से यह होता है।

यह अलग बात है ‌।

जो किताबें ज़यादा बिकेगी वही छपेगी। यह तो व्यवसाय है। बड़े बड़े संस्थान बड़ी मात्रा मे खरीद करते हैं।

इससे साहित्य लाईब्रेरी मे जाकर पाठको तक पहुँच जाती है।

कुछ प्रकाशकों के लिए पुस्तकें माल हो शायद । जिन्हें उन्हे बेचना है।

कुछ मजबूरी से छपती है क्योंकि उनका पाठक वर्ग है। साहित्य मे पुरुस्कार प्राप्त लोग की किताबें खूब बिकती हैं।

जो क्लासिक साहित्य है उसका तो कहना ही क्या।

तो पुस्तक मेले मे जाने पर कुछ अनुभव याद आ गये।

पुस्तकों से लगाव है और प्रकाशकों द्वारा लोग पुस्तक खरीदते अच्छे लगे।

ईबुक्स के ज़माने मे पुस्तक मेले महत्वपूर्ण लगे। वैसे अब लोग साहित्य मोबाइल आदि मे पढ़ लेते हैं।

मुझे तो बहुत लोगो के साथ किताबें ज़रा ज्यादा पसंद हैं।

वैसे समय बदल रहा है और ईबुक्स आदि तकनीक से पाठक़ो की संख्या बहुत बढी है।

कुछ को यह कहते भी सुना कि भाई कौन ले इतनी महगी किताबें,,,,,

पर मै तो स्थिति न होने पर भी खरीद लाया। क्योंकि किताबें कभी नही समाप्त होगी ‌। ‌

वैसे कुछ लोग खुद छाप कर खुद पहुचा देते हैं,,,,

मै भी,,,, चालीस पुस्तके छपी हैं मेरी। और अब उनकी कोई भी प्रति नही है मेरे पास।

पर प्रकाशकों की प्रासंगिकता महत्वपूर्ण है ‌। इसमे कोई शक नही है।

पुस्तक मेले मे जाकर बहुत अच्छा लगता है।

तब और भी जब वहां पाठक आये किताबें खरीदने।

लौट रहा था तो सांस्कृतिक कार्यक्रम मे अपार युवा उसी जगह थे जहाँ पुस्तक मेला लगा था ‌।

क्रेज़ किताबों की तरफ भी होगा इतना,,,,? शायद होगा,,,, इस फैंटसी के साथ लौट आया।

 

पुस्तकों के लिए भी भीड़ उमड़ेगी,,,,,,,,, यह यह फैंटेसी लेकर लौट आया

सच है कि किताबें कभी समाप्त नही होगी।

_ डा अतुल शर्मा

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