रक्षाबंधन पर हरूंता बुग्याल जा पहुंचे बाल वैज्ञानिक, हरे भरे वृक्षों पर रक्षासूत्र बांध के लौटे

देहरादून/उत्तरकाशी

रक्षाबंधन के पर्व ने जूनियर साइंटिस्ट को सीधे प्रकृति की गोद में पहुंचा दिया। रक्षाबंधन के मौके पर भाई-बहन के स्नेह और सुरक्षा के रिश्ते के साथ पीएम श्री कमलाराम नौटियाल राजकीय आदर्श इंटर कॉलेज धौंतरी के बाल वैज्ञानिकों ने प्रकृति से भी रक्षा का रिश्ता जोड़ा। छात्र-छात्राओं ने समुद्रतल से लगभग 2900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हरुंता बुग्याल पहुंचकर पेड़ों को रक्षासूत्र बांधे और जंगल, जलस्रोत तथा बुग्यालों के संरक्षण का संकल्प लिया।

हरुंता की हरी भरी वादियां इस दौरान विद्यार्थियों के लिए प्रकृति की खुली प्रयोगशाला बनीं। राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस 2026-27 की शोध परियोजना के अंतर्गत बाल वैज्ञानिकों ने बुग्याल की वनस्पतियों, जैव-विविधता, मिट्टी, जलस्रोत और पारिस्थितिकी का अध्ययन किया। विद्यार्थियों ने क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताओं का अवलोकन करने के साथ बुग्यालों पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभावों और उनके संरक्षण की संभावनाओं से संबंधित जानकारियां भी एकत्र कीं।

इस अभियान को रक्षासूत्र आंदोलन के प्रणेता एवं प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुरेश भाई के विचारों से विशेष प्रेरणा मिली। हरुंता भ्रमण से पूर्व उन्होंने विद्यालय पहुंचकर विद्यार्थियों से संवाद किया और रक्षासूत्र आंदोलन की पृष्ठभूमि तथा वनों को बचाने में जनभागीदारी की भूमिका के बारे में बताया।

उन्होंने विद्यार्थियों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने और स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने के लिए प्रेरित किया। विद्यालय परिवार ने पर्यावरण संरक्षण में उनके दीर्घकालीन योगदान के लिए उन्हें ‘विरासत के हस्ताक्षर’ के रूप में सम्मानित किया।

प्रधानाचार्य शांति प्रसाद नौटियाल ने कहा कि इस प्रकार के क्षेत्रीय अध्ययन विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़कर प्रकृति को समझने का अवसर देते हैं। इससे उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती है।

शिक्षक डॉ. शंभू प्रसाद नौटियाल एवं अरुण नौटियाल के मार्गदर्शन में कृष्णा, संध्या, रंजना, अमीषा, सुमित, गुलाब, सुधांशु, आकांक्षा और हिमांशु सहित अनेक विद्यार्थियों ने अभियान में भाग लिया।

उधर हरुंता से लौटे बाल वैज्ञानिक अपने साथ केवल अध्ययन से प्राप्त जानकारियां ही नहीं, बल्कि हिमालय की इस प्राकृतिक धरोहर को सहेजने का संकल्प भी लेकर लौटे।

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